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अभिभाषण

भारत के राष्ट्रपति, श्री राम नाथ कोविन्द का संविधान दिवस के अवसर पर संबोधन

नई दिल्ली : 26.11.2021
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संविधान दिवस के दिन, आप सबके साथ यहां उपस्थित होकर मुझे बहुत प्रसन्नता हो रही है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतन्त्र है। मुझे विश्वास है कि आप सब भी इस अवसर पर हमारे महान लोकतंत्र के प्रति गौरव का अनुभव कर रहे हैं। इसी सेंट्रल हॉल में 72 वर्ष पहले हमारे संविधान निर्माताओं ने स्वाधीन भारत के उज्ज्वल भविष्य के दस्तावेज को यानि हमारे संविधान को अंगीकार किया था तथा भारत की जनता के लिए आत्मार्पित किया था।

हमारे देशवासियों ने जब अपनी नियति के निर्धारण का अधिकार हासिल किया, उस समय का भारत, लंबे विदेशी शासन के दौरान किए गए शोषण से त्रस्त था। उस समय हमारे देश के करोड़ों लोग गरीबी और निरक्षरता का दंश भोग रहे थे। उस स्थिति को बदलने के लिए तथा राष्ट्र निर्माण के लिए लोगों में उत्साह जाग्रत हो चुका था। हमारे कर्मठ देशवासियों को केवल एक संवैधानिक संरचना की आवश्यकता थी। लगभग सात दशक की अल्प अवधि में ही, भारत के लोगों ने लोकतान्त्रिक विकास की एक ऐसी अद्भुत गाथा लिख दी है जिसने समूची दुनिया को विस्मित कर दिया है। मैं यह मानता हूं कि भारत की यह विकास यात्रा, हमारे संविधान के बल पर ही आगे बढ़ती रही है।

हमारे संविधान में वे सभी उदात्त आदर्श समाहित हैं जिनके लिए विश्व के लोग भारत की ओर सम्मान और आशा भरी दृष्टि से देखते रहे हैं। "हम भारत के लोग", इन शब्दों से आरम्भ होने वाले हमारे संविधान से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत का संविधान लोगों की आकांक्षाओं की सामूहिक अभिव्यक्ति है। संविधान सभा के सदस्यों ने जन प्रतिनिधि की हैसियत से, संविधान के प्रत्येक प्रावधान पर चर्चा और बहस की। वे साधारण लोग नहीं थे। उनमें से अनेक सदस्य कानून के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके थे, अनेक सदस्य अपने-अपने क्षेत्र के प्रतिष्ठित विद्वान थे और कुछ तो दार्शनिक भी थे। लेकिन संविधान के निर्माण में वे सभी संविधान सभा के लिए निर्वाचित जन प्रतिनिधि के रूप में ही भाग ले रहे थे। उनके शब्दों के पीछे उनके सत्कार्यों और नैतिकता का आभा मंडल था। उनके चरित्र की महानता का परिचय हमारे स्वाधीनता संग्राम में उनकी भागीदारी के दौरान लोगों को मिल चुका था। संविधान निर्माण के लगभग तीन वर्षों में, उन महान विभूतियों ने भारत की सामूहिक परिकल्पना को बड़े मनोयोग से स्वरुप प्रदान किया। मुझे प्रसन्नता है कि आज संविधान सभा की चर्चाओं तथा संविधान के calligraphed version और updated version के digital संस्करण जारी कर दिए गए हैं। इस प्रकार, टेक्नॉलॉजी की सहायता से, ये सभी अमूल्य दस्तावेज़ सबके लिए सुलभ हो गए हैं।

संविधान सभा की चर्चाओं में राष्ट्र निर्माण के लिए मानवीय चिंतन और चेतना की पराकाष्ठा के दर्शन होते हैं। उन चर्चाओं के Digital version से केवल देशवासियों को ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को, विशेषकर युवा पीढ़ी को, हमारे देश की महानता और क्षमता की जानकारी मिलेगी और भविष्य के लिए मार्गदर्शन भी प्राप्त होगा। संविधान के calligraphed version से लोगों को हमारी कला, संस्कृति एवं परम्परागत कथाओं के महान आदर्शों की झलक कलात्मकता के सर्वश्रेष्ठ रूप में देखने को मिलेगी। शासन व्यवस्था के आधारभूत ग्रन्थ की इतनी कलात्मक प्रस्तुति का उदाहरण अन्यत्र शायद ही देखने को मिले। संविधान के updated version से नागरिकों, विशेषकर विद्यार्थियों को, हमारी संवैधानिक प्रगति की अब तक की यात्रा की जानकारी प्राप्त होगी। संवैधानिक लोकतंत्र के विषय पर online quiz कराने की पहल अत्यंत सराहनीय है। यह रोचक माध्यम हमारे नागरिकों, विशेषकर युवा पीढ़ी में संवैधानिक मूल्यों के संवर्धन में बहुत प्रभावी सिद्ध होगा।

माननीय सांसदगण,

हमारे संविधान निर्माताओं ने, देशवासियों में साक्षरता की कमी तथा अनेक अन्य आशंकाओं के बावजूद जन साधारण के विवेक में अटूट आस्था दिखाते हुए Universal Adult Franchise का अधिकार सभी नागरिकों को दिया। इसके पहले किसी भी लोकतंत्र में आरम्भ से ही Universal Adult Franchise का अधिकार प्रदान नहीं किया गया था। प्रारूप समिति के अध्यक्ष, डॉक्टर बाबासाहेब आम्बेडकर ने 16 जून 1949 को जब Universal Adult Franchise का प्रस्ताव प्रस्तुत किया, तो वह प्रस्ताव, बिना किसी खास प्रतिरोध के, सर्वसम्मति से पारित हो गया। इस सन्दर्भ में विशेष रूप से यह तथ्य उल्लेखनीय है कि इंग्लैंड और अमेरिका जैसे देशों में महिलाओं को लम्बे संघर्ष के बाद मताधिकार प्राप्त हो सका। परन्तु हमारे देश में न केवल महिलाओं को आरम्भ से ही मताधिकार प्रदान किया गया बल्कि कई महिलाएं संविधान सभा की सदस्य थीं और उन्होंने संविधान के निर्माण में अभूतपूर्व योगदान दिया। हम भारत के लोग यह गर्व से कह सकते हैं कि हमारे संविधान के निर्माण में founding-fathers के साथ-साथ founding-mothers ने भी अपना योगदान दिया है।

पश्चिम के कुछ विद्वान यह कहते थे कि भारत में वयस्क मताधिकार की व्यवस्था विफल हो जाएगी। परन्तु यह प्रयोग न केवल सफल रहा, अपितु समय के साथ और मजबूत हुआ है। यहां तक कि अन्य लोकतंत्रों ने भी इससे बहुत कुछ सीखा है। हमारी आज़ादी के समय, राष्ट्र के समक्ष उपस्थित चुनौतियों को यदि ध्यान में रखा जाए, तो ‘भारतीय लोकतंत्र’ को निस्संदेह मानव इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक माना जा सकता है। इस उपलब्धि के लिए, हम संविधान निर्माताओं की दूरदर्शिता और जन-गण-मन की बुद्धिमत्ता को नमन करते हैं।

माननीय सांसदगण,

26 नवंबर 1949 को, संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में संविधान पर हस्ताक्षर करने से कुछ ही क्षण पहले, डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने एक वक्तव्य दिया था। उनके कुछ शब्दों को मैं यहां दोहराना चाहता हूं। उन्होंने कहा था – [QUOTE] "एक विधि निर्माता न केवल बुद्धिमान होना चाहिए, बल्कि उसमें हर मामले में संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की योग्यता भी होनी चाहिए ताकि वह स्वतंत्र रूप से कार्य कर सके और सबसे बढ़कर जीवन के मूलभूत आदर्शों के प्रति सच्चा बन सके। यदि एक शब्द में कहें तो उसे चरित्रवान होना चाहिए।” [UNQUOTE]

डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद के अनुसार, जन-प्रतिनिधियों की योग्यता का कोई मानदंड नहीं हो सकता। फिर भी, सांसदों से उनकी अपेक्षा उनके वक्तव्य में स्पष्ट है। वे चाहते थे कि संसद सदस्यों में उच्च स्तर की नैतिकता होनी चाहिए, क्योंकि उनकी दोहरी जिम्मेदारी होती है – पहली, अपने स्वयं के आचरण की और दूसरी - जन प्रतिनिधि के रूप में किए गए कार्यों की।

माननीय सांसदगण,

हमारी यह संसद, भारत की लोकतान्त्रिक व्यवस्था का सर्वोच्च शिखर है। संसद की गरिमा की रक्षा में, संसद के सभी सदस्य शामिल हैं, चाहे वे सत्ता पक्ष के हों या प्रतिपक्ष के। सभी सांसद यहां कानून बनाने के साथ-साथ जन-हित से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करने के लिए एकत्र होते हैं। वस्तुतः ग्राम-सभा, विधान-सभा और संसद के निर्वाचित प्रतिनिधियों की केवल एक ही प्राथमिकता होनी चाहिए। वह प्राथमिकता है - अपने क्षेत्र के सभी लोगों के कल्याण के लिए और राष्ट्र-हित में कार्य करना। विचारधारा में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन कोई भी मतभेद इतना बड़ा नहीं होना चाहिए कि वह जन सेवा के वास्तविक उद्देश्य में बाधा बने। सत्ता-पक्ष और प्रतिपक्ष के सदस्यों में प्रतिस्पर्धा होना स्वाभाविक है – लेकिन यह प्रतिस्पर्धा बेहतर प्रतिनिधि बनने और जन-कल्याण के लिए बेहतर काम करने की होनी चाहिए। तभी इसे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा माना जाएगा। संसद में प्रतिस्पर्धा को प्रतिद्वंद्विता नहीं समझा जाना चाहिए। हम सब लोग यह मानते हैं कि हमारी संसद 'लोकतंत्र का मंदिर' है। अतः हर सांसद की यह जिम्मेदारी बन जाती है कि वे लोकतंत्र के इस मंदिर में श्रद्धा की उसी भावना के साथ आचरण करें जिसके साथ वे अपने पूजा-गृहों और इबादत-गाहों में करते हैं।

प्रतिपक्ष वास्तव में, लोकतंत्र का सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है। सच तो यह है कि प्रभावी प्रतिपक्ष के बिना लोकतंत्र निष्प्रभावी हो जाता है। सरकार और प्रतिपक्ष, अपने मतभेदों के बावजूद, नागरिकों के सर्वोत्तम हितों के लिए मिलकर काम करते रहें, यही अपेक्षा की जाती है। हमारे संविधान निर्माताओं ने ऐसी ही परिकल्पना की थी और राष्ट्र-निर्माण के लिए यही आवश्यक भी है।

यदि आप सभी सांसदगण अपने उत्तरदायित्व को स्वाधीनता संग्राम के आदर्शों के विस्तार के रूप में देखें तो आपको संविधान निर्माताओं की विरासत को और मजबूत बनाने की ज़िम्मेदारी का एहसास होगा। यदि आप यह महसूस करेंगे कि आप उन स्थानों पर बैठे हैं जहां कभी हमारे संविधान निर्माता-गण बैठते थे, तो स्वत: ही आप सबको इतिहास-बोध और कर्तव्य-बोध का गहरा अनुभव होगा।

माननीय सांसदगण,

हमारे देशवासियों के कर्तव्य-बोध के उल्लेखनीय उदाहरण, कोविड-19 की महामारी के दौरान दिखाई दिए। हमारी विशाल जनसंख्या और इसके घनत्व को देखते हुए, इस महामारी की असाधारण चुनौती का सामना करना हमारे लिए और भी कठिन था। फिर भी, देशवासियों ने इस चुनौती को स्वीकार किया और प्रशासन ने भी, अधिक से अधिक लोगों की जान बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। महामारी के शुरुआती महीनों का दौर गुज़रे अब काफी समय हो गया है, लेकिन वे दृश्य हमारे मनो-मस्तिष्क में लंबे समय तक अंकित रहेंगे कि कैसे सभी देशवासियों ने एक-दूसरे की मदद करने के भरपूर प्रयास किए और किस प्रकार से अलग-अलग क्षेत्रों के कोरोना योद्धाओं ने भाईचारे के अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किए। हमने न केवल अपने लिए वैक्सीन विकसित की, बल्कि विश्व के अन्य देशों को भी वैक्सीन उपलब्ध कराने का बीड़ा उठाया। यह प्रयास, मानवता के इतिहास में अपनी तरह का सबसे बड़ा अभियान माना जाएगा।

माननीय सांसदगण,

हमने हाल ही में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती का वर्ष पर्यन्त समारोह मनाया है। अब हम स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। यह हम सब के लिए प्रसन्नता का विषय है कि 'आजादी का अमृत महोत्सव' के दौरान आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों में देश भर के लोग बढ़-चढ़कर भागीदारी कर रहे हैं। उनके उत्साह से यह प्रकट होता है कि उनके हृदय में उन ज्ञात और अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति गहरा सम्मान है जिनके त्याग और बलिदान के फलस्वरूप हमारे लिए आजादी की खुली हवा में सांस लेना संभव हो सका है। इस तरह के ऐतिहासिक महत्व के अवसर, हमें उन जीवन-मूल्यों की भी याद दिलाते हैं जिनके लिए हमारे स्वाधीनता सेनानियों ने संघर्ष किया और जो संविधान की उद्देशिका में न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता के रूप में उल्लिखित हैं। आइए, संविधान दिवस के अवसर पर हम अपने दैनिक जीवन में उन महान राष्ट्रीय आदर्शों पर चलने के लिए स्वयं को पुनः समर्पित करें। इन आदर्शों का पालन करने से विश्व मंच पर हमारी उपस्थिति और मजबूत होगी तथा किसी भी चुनौती का सामना हम प्रभावी ढंग से कर सकेंगे।

माननीय सांसदगण,

हमारे संविधान के preamble अर्थात उद्देशिका को संविधान की अंतरात्मा कहा जाता है। आज के इस कार्यक्रम के अंत में सभी देशवासियों द्वारा संविधान की उद्देशिका का सामूहिक पाठ आयोजित करने की पहल अत्यंत सराहनीय है। इससे हमारे सभी देशवासियों में संविधान के आदर्शों के प्रति गौरव का भाव और मजबूत होगा। कुछ ही देर में हम सब संविधान की उद्देशिका का अक्षरशः पाठ करेंगे। संविधान दिवस के अवसर पर मैं सभी देशवासियों को हार्दिक बधाई देता हूं।

धन्यवाद,

जय हिन्द!

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